भारतीय भाषा समिति के सहयोग से एएमयू में ‘भारतीय भाषा परिवार’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन का अयोजन
देशभर से आए प्रख्यात विद्वानों और शिक्षाविदों ने भारत की भाषाई विरासत तथा समकालीन चुनौतियों पर विचार-विमर्श करेंगे
अलीगढ़, 16 फरवरीः अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग द्वारा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के सहयोग से “भारतीय भाषा परिवारः भाषाविज्ञान में एक नया दृष्टि” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया है। इस सम्मेलन में देशभर से आए प्रख्यात विद्वानों और शिक्षाविदों ने भारत की भाषाई विरासत तथा समकालीन चुनौतियों पर विचार-विमर्श करेंगे।
विश्वविद्यालय पॉलिटेक्निक सभागार में आयोजित उद्घाटन सत्र में भारतीय भाषाओं की समेकित एवं समावेशी रूपरेखा में पुनर्समीक्षा की शैक्षणिक तथा राष्ट्रीय प्रासंगिकता पर वक्ताओं ने विचार रखे
मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. पंकज के. पी. श्रेयस्कर ने अपने उद्घाटन भाषण में भारत की भाषाई विविधता को उसकी सभ्यतागत शक्ति का प्रतीक बताया।
उन्होंने विविध स्रोतों से ज्ञान ग्रहण करने तथा तकनीकी नवाचार और सार्वभौमिक शिक्षा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए उन्होंने पाठ्यक्रम में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराओं और पर्यावरण चेतना के समावेश, बहुभाषी शिक्षण मार्गों के विकास तथा विद्यालय स्तर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा प्रारंभ किए जाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
अध्यक्षीय उद्बोधन में एएमयू के सहकुलपति प्रो. मोहम्मद मोहसिन खान ने ‘भारतीय भाषा परिवार’ पहल के राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं और बहुभाषिकता का संवर्धन समकालीन शिक्षा की प्राथमिकताओं में केंद्रीय स्थान रखता है। उन्होंने डिजिटलीकरण, अनुवाद और भाषाओं के व्यवस्थित प्रलेखन जैसे मुद्दों पर भाषाविज्ञान की सक्रिय भूमिका की आवश्यकता बताई।
दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषाविज्ञान विभाग की प्रो. शोभा सत्यनाथ ने सम्मेलन को एशियाई वैश्वीकरण के नए चरण में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक बिन्दु बताया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक पाश्चात्य भाषा-प्रकारिकी मॉडल भारतीय भाषाओं के जटिल संबंधों को समझाने में पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण से भाषाविज्ञान के पुनर्विचार तथा मानविकी और सामाजिक विज्ञानों को स्वदेशी बौद्धिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
एएमयू के कुलसचिव प्रो. आसिम जफर ने भाषाविज्ञान विभाग की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय को सामूहिक स्मृति और बौद्धिक विविधता का भंडार बताया। उन्होंने डिजिटल शिक्षा, स्वयं मंच पर मुक्त ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और संस्थागत ढांचे की सुदृढ़ता का उल्लेख किया तथा कहा कि भाषा नीतियों की सफलता निरंतर शैक्षणिक गंभीरता पर निर्भर करती है।
कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. टी.एन. सतीशन ने भारत की समृद्ध भाषाई विविधता और भाषाओं के गहरे संरचनात्मक व सांस्कृतिक अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने मातृभाषा आधारित शिक्षा, जनजातीय तथा लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और भाषाई समेकन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग की आवश्यकता बताई।
स्वागत भाषण में विभागाध्यक्ष प्रो. एम. जे. वारसी ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए भारतीय भाषा परिवार को सह-अस्तित्व और संवाद से विकसित साझा सभ्यतागत विरासत बताया। उन्होंने अल्पज्ञात भाषाओं के प्रलेखन और बहुभाषिक यथार्थ के अध्ययन पर बल दिया।
उद्घाटन सत्र में सार-संग्रह पुस्तिका, ‘अलीगढ़ जर्नल ऑफ लिंग्विस्टिक्स’ के नवीन अंक, “भारतीय भाषा परिवार भाषाविज्ञान में एक नई रूपरेखा”, “भारतीय भाषा परिवार दृष्टिकोण और क्षितिज” तथा “बहुभाषी भारत में संस्कृतियों के पार अनुवाद (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में)” पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।

उद्घाटन कार्यक्रम के पश्चात प्रो. शोभा सत्यनाथ ने मुख्य वक्तव्य देते हुए भारतीय भाषाविज्ञान के उपनिवेश-मुक्त पुनर्संरेखन का आह्वान किया। उन्होंने बंगाली और असमिया उपभाषा क्षेत्रों के उदाहरणों के माध्यम से पूर्वी भारत में भाषाई परिवर्तन को ऐतिहासिक व्यापारिक नेटवर्क और क्षेत्रीय अंतर्संबंधों के संदर्भ में समझने की आवश्यकता बताई।
मुख्य सत्र की अध्यक्षता अंग्रेजी विभाग के प्रो. मोहम्मद रिजवान खान ने की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मेहविश मोहसिन ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. शबाना हमीद ने प्रस्तुत किया।

