होर्मुज स्ट्रेट के बाद अब एक और समुद्री ऑयल रूट बाब अल-मंदेब स्ट्रेट संकट में है। यमन के हूती विद्रोहियों ने यहां कब्जे का एलान किया है। बाब-अल-मंदेब एशिया और यूरोप के बीच जहाजों की आवाजाही के लिए अहम रास्ता है। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा कि सऊदी समर्थित सेनाओं ने बाब अल-मंदेब के बीच स्थित पेरिम द्वीप पर से कंट्रोल खो दिया है। अब उनका 5,400 वर्ग किमी इलाके पर कब्जा हो गया है। हूती प्रवक्ता ने कहा कि इस स्ट्रेट से सऊदी अरब को छोड़, बाकी सभी देशों के जहाजों के गुजरने की इजाजत है। हूती विद्रोहियों का कहना है कि सऊदी अरब ने उनकी आर्थिक नाकेबंदी कर रखी है। यमन हूती संघर्ष से जुड़ीं फोटोज बाब अल-मंदेब पर कब्जा करने में 9 दिन लगे 3 सितंबर: हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तीन तरफ से हमला शुरू किया। इसके बाद उन्होंने मोखा शहर की घेराबंदी की। 8 सितंबर: हूतियों की बढ़त देखकर सऊदी अरब ने हमला शुरू कर दिया। मिसाइल और ड्रोन हमलों में 73 लोग घायल हुए। 10 सितंबर: हूतियों ने मोखा शहर और उसके बंदरगाह पर कब्जा कर लिया। इसके बाद हूती लड़ाके बाब अल-मंदेब की तरफ बढ़े और धुबाब के साथ लाल सागर के आसपास के द्वीपों पर भी दबाव बनाया। 11 सितंबर: पेरिम यानी मयून द्वीप पर कब्जा कर लिया गया। यहां कब्जे से हूतियों को इस समुद्री रास्ते के बेहद करीब रणनीतिक ठिकाना मिल गया है। ईरान ने हूतियों की मदद की रॉयटर्स के मुताबिक, ईरान ने हूतियों को सैन्य सलाह और मदद दी थी। एक राजनयिक के मुताबिक, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कई वरिष्ठ कमांडर यमन में मौजूद हैं। अभियान शुरू होने से पहले ईरान और हूतियों के बीच कई बैठकें भी हुई थीं। हालांकि, मोखा पर हमला करने का फैसला हूतियों ने खुद लिया था। यमन के पांच सैन्य अधिकारियों ने भी कहा कि लाल सागर में हूतियों के नए अभियान में ईरान ने मदद की थी। यमनी सूत्रों का दावा है कि कुद्स फोर्स के कमांडर अब्दोलरेजा शहलाई हूतियों के अभियान को दिशा दे रहे थे। ईरान ने इसकी पुष्टि नहीं की है। ट्रम्प ने सऊदी की एयरस्ट्राइक की मांग ठुकराई एक्सिऑन की रिपोर्ट के मुताबिक हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब को अमेरिकी मदद की उम्मीद थी। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रम्प से सीधे अमेरिकी हवाई हमले करने की अपील की थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने इनकार कर दिया। हालांकि अमेरिका क्षेत्र की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। CNN के मुताबिक, 100 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में मौजूद हैं। एक अमेरिकी अधिकारी ने इनकी संख्या करीब 200 बताई है। ये अमेरिकी सैन्यकर्मी सऊदी सेना को हूतियों से जुड़ी खुफिया जानकारी पता लगाने मदद कर रहे हैं। इस तरह अमेरिका सीधे सैन्य कार्रवाई से बच रहा है। हूती और सऊदी के बीच दुश्मनी की वजह धार्मिक फर्क ने तनाव बढ़ाया: हूती यमन के जायदी शिया समुदाय से आते हैं, जबकि सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है। दोनों की धार्मिक मान्यताओं में फर्क है। हालांकि, हूती-सऊदी संघर्ष को सिर्फ शिया बनाम सुन्नी की लड़ाई समझना सही नहीं होगा। विवाद की जड़ 1990 के दशक में पड़ी: यमन के उत्तरी हिस्से में जायदी समुदाय को लगने लगा था कि सरकार उनके राजनीतिक और धार्मिक हितों की अनदेखी कर रही है। इसी असंतोष से हूती आंदोलन मजबूत हुआ। 2004 में यमनी सरकार और हूतियों के बीच पहली बड़ी सशस्त्र लड़ाई हुई। 2014 में सत्ता की लड़ाई तेज हो गई: हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और राष्ट्रपति अब्द-रब्बू मंसूर हादी की सरकार को चुनौती दी। सऊदी अरब को डर था कि हूतियों के मजबूत होने से ईरान का प्रभाव उसकी दक्षिणी सीमा तक पहुंच जाएगा। 2015 में सऊदी सीधे युद्ध में उतर गया: सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए और उनके कब्जे वाले इलाकों की नाकेबंदी की, ताकि हथियार और दूसरे सामान वहां न पहुंच सकें। जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू किए। फिर इसमें ईरान-सऊदी की दुश्मनी भी जुड़ गई: धीरे-धीरे यह लड़ाई सिर्फ यमन की सत्ता का संघर्ष नहीं रही। यह ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई का भी हिस्सा बन गई। सऊदी हूतियों को ईरान के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखता है, जबकि ईरान हूतियों को सैन्य निर्देश देने से इनकार करता है। ———————- ये खबर भी पढ़ें… इजराइल ने लेबनान में हिजबुल्लाह की 2km लंबी सुरंग उड़ाई: विस्फोट के बाद 4.1 तीव्रता का भूकंप आया; नेतन्याहू बोले- मिशन पूरा, हैप्पी न्यू ईयर इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह की 2 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सुरंग को ब्लास्ट कर तबाह कर दिया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

