कॉमनवेल्थ खेल चुके नौरू के राष्ट्रपति और न्यूए के प्रधानमंत्री:स्टीफन सत्ता से पहले विजेता बने; जबकि डाल्टन पीएम रहते हुए मैदान में उतरे

दुनिया में ऐसे नेता बहुत कम हैं, जिन्होंने पहले अपने देश के लिए मैदान में पसीना बहाया और बाद में उसी देश की कमान भी संभाली प्रशांत महासागर के दो द्वीपीय देश, नौरू और न्यूए की कहानी इसी वजह से अलग है। इन दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने कॉमनवेल्थ गेम्स में खिलाड़ी के रूप में हिस्सा लिया। फर्क सिर्फ इतना है कि नौरू के मार्कस स्टीफन राष्ट्रपति बनने से पहले खिलाड़ी थे, जबकि न्यूए के डाल्टन टैगलागी प्रधानमंत्री रहते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में उतरे। मार्कस स्टीफन की कहानी किसी फिल्म जैसी लगती है। 1990 के ऑकलैंड कॉमनवेल्थ गेम्स में नौरू ने पहली बार हिस्सा लिया। टीम में सिर्फ एक खिलाड़ी था- 20 साल के मार्कस स्टीफन। किसी को उनसे पदक की उम्मीद नहीं थी। लेकिन उन्होंने एक गोल्ड और दो सिल्वर मेडल जीतकर सबको चौंका दिया। पूरे देश में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया गया। उस समय नौरू में वेटलिफ्टिंग फेडरेशन भी नया-नया बना था और उसकी सबसे बड़ी पहचान स्टीफन ही थे। 1992 बार्सिलोना ओलिंपिक में उन्हें एक अजीब मुश्किल का सामना करना पड़ा। नौरू तब तक अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति का सदस्य नहीं बना था। इसलिए उन्हें समोआ के पासपोर्ट पर खेलना पड़ा। 1996 अटलांटा ओलिंपिक तक नौरू को सदस्यता मिल चुकी थी और इस बार स्टीफन अपने देश का झंडा लेकर उद्घाटन समारोह में सबसे आगे चले। उन्होंने चार कॉमनवेल्थ गेम्स में सात गोल्ड और पांच सिल्वर मेडल जीते। यह उपलब्धि अब भी कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग के इतिहास में सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है खेल से संन्यास लेने के एक साल बाद स्टीफन राजनीति में आए। उन्होंने पिता की संसदीय सीट संभाली और 2007 में नौरू के राष्ट्रपति बने। अब वे नौरू के सबसे लंबे समय तक रहने वाले स्पीकर हैं। दूसरी ओर, न्यूए के प्रधानमंत्री डाल्टन टैगलागी ने अलग मिसाल पेश की। उन्होंने 2014 और 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में लॉन बाउल्स खेला। 2020 में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने 2022 बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में खिलाड़ी के रूप में हिस्सा लिया। खास बात यह रही कि उन्होंने अपने 14 वर्षीय बेटे के साथ जोड़ी बनाकर मुकाबले खेले। हालांकि उनकी टीम कोई मैच नहीं जीत सकी। उसी दौरान टीम चयन को लेकर उनके देश में अदालत तक मामला पहुंच गया, लेकिन वे प्रतियोगिता और सरकारी जिम्मेदारियां दोनों निभाते रहे। इस बार ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में दोनों नेता नहीं हैं। स्टीफन अब खेल प्रशासन में सक्रिय हैं, जबकि टैगलागी हाल ही में तीसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए हैं और बेहद कम बहुमत वाली सरकार संभाल रहे हैं। दोनों की राहें अब अलग हैं, लेकिन उनकी कहानी यह बताती है कि छोटे देशों में भी खिलाड़ी सिर्फ मेडल नहीं जीतते, वे कभी-कभी पूरे देश की तकदीर भी लिखते हैं।

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