जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने सक्सोनी-आनहाल्ट के राज्य चुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। एग्जिट पोल के मुताबिक, AfD को करीब 44% वोट मिले हैं और वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। यह नतीजा चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और उनकी कंजरवेटिव पार्टी के लिए बड़ा झटका है। AfD पहली बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी जर्मन राज्य में सत्ता के इतने करीब पहुंची है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन के विशेष दूत किरिल दिमित्रिएव नेने इस जीत को ऐतिहासिक बताया है। वहीं, फ्रांस ने इसे पूरे यूरोप के लिए गंभीर समय बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर चुनाव के अनुमानित नतीजे की एक तस्वीर शेयर की है। हालांकि उन्होंने AfD के समर्थन में कुछ नहीं लिखा। जर्मनी की राजनीति में AfD की जीत कितनी बड़ी है? जर्मनी में नाजी शासन के इतिहास की वजह से मुख्यधारा की पार्टियां लंबे समय से बहुत ज्यादा दक्षिणपंथी मानी जाने वाली पार्टियों से दूरी रखती हैं। AfD पर भी दक्षिणपंथी चरमपंथ के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए उसका किसी राज्य में सत्ता के करीब पहुंचना जर्मन राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। और बात सिर्फ इस एक राज्य की नहीं है। AfD राष्ट्रीय स्तर पर भी सबसे लोकप्रिय पार्टी बन चुकी है। हालिया INSA सर्वे में उसे करीब 28% समर्थन मिला है, जबकि मर्ज की CDU/CSU करीब 20% पर है। AfD की राजनीति में इमिग्रेशन, शरणार्थी और जर्मनी की राष्ट्रीय पहचान बड़े मुद्दे हैं। AfD सबसे बड़ी पार्टी बनी, फिर भी सरकार बनाना मुश्किल सबसे ज्यादा सीट जीतने के बाद भी AfD के लिए सत्ता हासिल करना आसान नहीं है। जर्मनी की मुख्यधारा की पार्टियां AfD के साथ सरकार बनाने के लिए तैयार नहीं हैं। CDU समेत दूसरी बड़ी पार्टियां लंबे समय से AfD से दूरी बनाए हुए हैं और उसके साथ गठबंधन करने से इनकार करती रही हैं। यही वजह है कि चुनाव में सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद AfD के लिए सरकार बनाना आसान नहीं है। AfD के पास 83 में से 39 सीटें हैं, जबकि बहुमत के लिए 42 सीटों की जरूरत है। यानी उसे सरकार बनाने के लिए कम से कम तीन और सीटों का समर्थन चाहिए। लेकिन कोई बड़ी पार्टी उसके साथ आने को तैयार नहीं है। ऐसे में AfD के सामने सरकार बनाने का रास्ता फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है। जर्मनी में AfD का समर्थन क्यों बढ़ रहा है? AfD खुद को मौजूदा पार्टियों के विकल्प के तौर पर पेश करती है। चुनाव प्रचार में पार्टी ने इमिग्रेशन, सुरक्षा और जर्मन पहचान को लेकर लोगों की चिंता को मुद्दा बनाया। उसके समर्थकों का कहना है कि मौजूदा पार्टियां इन समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही हैं। इसी नाराजगी का फायदा AfD को खासकर पूर्वी जर्मनी में मिल रहा है। AfD ने इस चुनाव में 35 साल के उलरिश जिगमुंड को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने नतीजे को ऐतिहासिक बताया। जिगमुंड ने कहा कि लोगों ने साफ कर दिया है कि वे राजनीतिक बदलाव चाहते हैं और इसके लिए AfD को मौका देना चाहते हैं। उन्होंने इसे 2029 के राष्ट्रीय चुनाव से पहले अहम कदम बताया। रूस के करीब मानी जाती है AfD, यूक्रेन की मदद रोकने की मांग AfD को रूस के प्रति नरम रुख रखने वाली पार्टी माना जाता है। पार्टी जर्मनी की ओर से यूक्रेन को दी जा रही सैन्य और दूसरी मदद का विरोध करती रही है। उसका कहना है कि जर्मनी को यूक्रेन को हथियार और सैन्य सहायता देने के बजाय अपने हितों पर ध्यान देना चाहिए। AfD जर्मनी में शरण लेने वाले यूक्रेनी नागरिकों को मिलने वाली मौजूदा व्यवस्था में भी बदलाव चाहती है। पार्टी यूक्रेन से आए लोगों को शरणार्थी का दर्जा देने की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की मांग करती रही है। उसका मानना है कि यूक्रेन से आने वाले लोगों के लिए जर्मनी की मौजूदा शरण और मदद की व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए। AfD की जीत से दुनियाभर के दक्षिणपंथी खेमे में खुशी अमेरिका में जेडीवेंस समेत कई रिपब्लिकन नेताओं ने AfD के बढ़ते प्रभाव का स्वागत किया। उनका मानना है कि इससे यूरोप में पारंपरिक पार्टियों की पकड़ कमजोर होगी और दूसरी पार्टियों के लिए भी राजनीति में आगे आने का रास्ता खुलेगा। AfD की जीत पर अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क ने भी बधाई दी। AfD की सह-संस्थापक और राष्ट्रीय नेता एलिस वीडल ने जब चुनाव में पार्टी की बढ़त की जानकारी सोशल मीडिया पर पोस्ट की तो मस्क ने जर्मन भाषा में अच्छा किया! लिखा। हंगरी के दक्षिणपंथी नेता और प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने खुले तौर पर AfD का समर्थन किया और जीत की बधाई दी। फ्रांस की प्रमुख दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और उनकी पार्टी के नेताओं ने भी जर्मन चुनाव नतीजों पर खुशी जताते हुए AfD को बधाई दी। फ्रांस बोला- राष्ट्रवाद और नफरत समाधान नहीं AfD की जीत पर फ्रांस की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। फ्रांस के यूरोप मामलों के मंत्री बेंजामिन हद्दाद ने इसे यूरोप के लिए गंभीर पल बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद और विदेशियों के प्रति नफरत किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। हालांकि, हद्दाद ने यह भी कहा कि यूरोपीय नेताओं को लोगों के गुस्से, चिंताओं और डर को गंभीरता से सुनना चाहिए। हद्दाद ने कहा कि यूरोप को अपना इतिहास नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी ऐतिहासिक अनुभव की वजह से फ्रांस और जर्मनी ने राजनीति में अलग रास्ता चुना है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने AfD की जीत पर इससे भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पोलैंड में सिर्फ ‘बेवकूफ या गद्दार’ ही जर्मनी में AfD की जीत से खुश हो सकते हैं। ————————— यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट-युद्ध का खर्च जुटाने पोर्न पर टैक्स लगाएगा यूक्रेन:236 करोड़ रुपए कमाई का अनुमान, 30 हजार ड्रोन खरीदे जा सकेंगे
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