इजराइल में प्रधानमंत्री चुनने का तरीका बदलने की चर्चा शुरू हो गई है। नेतन्याहू के विरोधी दल सीधे प्रधानमंत्री चुनने की पुरानी व्यवस्था वापस लाने पर विचार कर रहे हैं। इसके तहत जनता सांसदों और पार्टियों को वोट देने के अलावा सीधे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को भी चुन सकेगी। दरअसल, 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में किसी भी गुट को बहुमत नहीं मिला। नेतन्याहू के समर्थन वाले दलों को 53 सीटें मिलीं, जबकि विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलीं। वहीं, अरब पार्टियों के खाते में 19 सीटें आईं। इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। विपक्ष के पास अरब पार्टियों को मिलाकर 67 सीटें हैं, लेकिन उसके कई नेता अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं। ऐसे में सरकार बनाने का रास्ता मुश्किल हो गया है। इसी गतिरोध को खत्म करने के लिए विपक्ष सीधे प्रधानमंत्री चुनने की व्यवस्था पर विचार कर रहा है। प्रधानमंत्री चुनने का तरीका बदलने के लिए सरकार से जुड़े मूल कानून में संशोधन करना होगा। इसके लिए संसद के कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। हालांकि, अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम सहमति नहीं बनी है। इसे संसद में पेश भी नहीं किया गया है। पहले भी सीधे चुना जाता था प्रधानमंत्री इजराइल में यह व्यवस्था नई नहीं है। देश में 1996 और 1999 में प्रधानमंत्री और संसद के लिए अलग-अलग वोटिंग हुई थी। 2001 में भी सिर्फ प्रधानमंत्री चुनने के लिए अलग चुनाव कराया गया था। 1996 में बेंजामिन नेतन्याहू ने शिमोन पेरेज को हराकर प्रधानमंत्री पद का चुनाव जीता था। 1999 में एहुद बराक ने नेतन्याहू को हराया। वहीं, 2001 में एरियल शेरोन ने एहुद बराक को हराकर प्रधानमंत्री पद हासिल किया था। हालांकि, इस व्यवस्था से भी राजनीतिक समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। बाद में 2001 में इसे समाप्त कर दिया गया और देश फिर से संसदीय व्यवस्था पर लौट आया। टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक 10 नवंबर को नई संसद के 120 सांसदों के शपथ लेने की उम्मीद है। इसके बाद नई संसद काम शुरू कर सकती है। अगर विपक्ष इस प्रस्ताव को विधेयक के रूप में पेश करता है और जरूरी समर्थन जुटा लेता है, तो उस पर वोटिंग हो सकती है।

