अमेरिका में रिपब्लिकन की 50 साल में सबसे बड़ी हार:सरकार अपनी थी, चुनाव के लिए रिकॉर्ड पैसा, ट्रम्प को रोक नहीं पाए इसलिए हारे

तारीख- 28 अक्टूबर जगह- न्यूयॉर्क रिपब्लिकन पार्टी के करीब 25 चुनावी रणनीतिकार एक वीडियो कॉल पर जुड़े थे। बातचीत की शुरुआत ही साइनाइड (जहर) की गोली से हुई। पार्टी के लिए चुनावी सर्वे करने वाले टोनी फैब्रिजियो ने पूछा, ”आप पहले सफेद गोली (अच्छी खबर) लेना चाहेंगे या काली (बुरी खबर)?” इसके बाद रिपब्लिकन पार्टी के बड़े डेटा सलाहकारों में से एक टिम सेलर ने चुनाव के दो संभावित नतीजे बताए। पहला ये कि पार्टी के प्रचार के लिए जुटाए गए 40 करोड़ डॉलर का फंड सही वोटर्स तक पहुंच रहा है और लोग वोट देने भी आ रहे हैं। दूसरा नतीजा पार्टी की करारी हार को लेकर था। पार्टी की चुनावी कमान संभाल रहे जेम्स ब्लेयर ने हंसते हुए कहा, ”मैंने अपने अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी है। मेरा सुझाव है कि आप सब भी ऐसा ही करें।” उनकी बात सुनकर बाकी लोग हंसने लगे। करीब 30 मिनट तक कॉल पर ऐसे ही निराशा भरे मजाक चलते रहे। इसमें जेल का खाना खाने, राष्ट्रपति से माफी मिलने और देश छोड़कर भागने की बातें भी हुईं। नेतन्याहू का जिक्र करते हुए ब्लेयर ने तंज में कहा, “कम से कम बीबी जीत गए। वह हमारी रक्षा करेंगे।” इस पर फैब्रिजियो ने कहा, ”हां शायद हमें इजराइल में शरण मिल सकती है। डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन की 7 सीटें छीनीं एक साल पहले किसी को अंदाजा नहीं होगा कि रिपब्लिकन पार्टी की इतनी बड़ी हार होगी। पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए रिकॉर्ड पैसा था। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति इलॉन मस्क का साथ था। उन्होंने इस चुनाव में राष्ट्रपति चुनाव से भी ज्यादा पैसा लुटाया। सीनेट चुनाव में भी रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति मजबूत थी। चुनावी समीकरण ऐसे थे कि डेमोक्रेट्स को उन राज्यों में मुकाबला करना पड़ रहा था, जहां वे दशकों से नहीं जीते थे। हाउस चुनाव में ट्रम्प ने अपना बहुमत बढ़ाने के लिए एक और दांव चला। अमेरिका में आमतौर पर हर 10 साल में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदली जाती हैं। लेकिन ट्रम्प की टीम ने इस परंपरा को तोड़ते हुए बीच दशक में ही सीमाएं बदलने की कोशिश की। मकसद था ऐसे नए चुनावी क्षेत्र बनाना, जहां रिपब्लिकन उम्मीदवारों की जीत आसान हो जाए। इन तमाम कोशिशों के बावजूद रिपब्लिकन पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इसे पिछले 50 साल में पार्टी की सबसे बड़ी चुनावी हार में से एक माना जा रहा है। इसकी तुलना 1974 के चुनाव से की जा रही है। उस समय वाटरगेट कांड के बाद रिपब्लिकन पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 48 और सीनेट की 4 सीटें गंवाई थीं। इस बार रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेट की 7 सीटें गंवाई हैं। चुनाव से पहले सीनेट में उसके 53 सदस्य थे, जो घटकर 44 रह गए हैं। (2 सीटों पर गिनती जारी है)। वहीं, हाउस में भी पार्टी को बड़ा नुकसान हुआ है। शुरुआती नतीजों में वह करीब 25 सीटें गंवाती दिख रही थी। हालांकि, खबर लिखे जाने तक 45 सीटों पर मतगणना जारी थी। ईरान के खिलाफ जंग शुरू कर ट्रम्प ने अपना ही वादा तोड़ा चुनाव के नतीजे आने से पहले ही ट्रम्प सोचने लगे थे कि अगर कुछ फैसले नहीं लिए गए होते तो क्या होता। उनसे बातचीत करने वाले एक व्यक्ति के मुताबिक, ट्रम्प ने पूछा भी था, ”अगर हम ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू ही नहीं करते, तो मिडटर्म चुनाव में क्या होता?” ईरान युद्ध ने लोगों को बहुत नाराज किया क्योंकि ट्रम्प ने राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में वादा किया था कि अमेरिका कोई नया युद्ध शुरू नहीं करेगा। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने खुद नया युद्ध शुरू कर दिया। उन्होंने महंगाई कम करने का वादा किया था। लेकिन पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और महंगाई भी बढ़ गई। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर ट्रम्प ने कहा, ”यह एक छोटी सी कीमत है, जिसे चुकाया जा सकता है।” ट्रम्प का जंग खत्म करने का अनुमान गलत साबित हुआ ट्रम्प ने जब ईरान के खिलाफ जंग शुरू की तो उन्हें भरोसा था कि यह जल्दी खत्म हो जाएगा और अमेरिका को बड़ी जीत मिलेगी। लेकिन ट्रम्प का अनुमान गलत साबित हुआ। ट्रम्प लगातार दावा कर रहे थे कि अमेरिका ने जीत हासिल की है। लेकिन निजी बैठकों में उनके सलाहकार उन्हें होर्मुज स्ट्रेट बंद होने, पेट्रोल और खाद की कीमतें बढ़ने और अमेरिकी हथियारों के भंडार में तेजी से कमी आने की जानकारी दे रहे थे। युद्ध शुरू होने के करीब दो हफ्ते बाद मार्च में मतदाताओं के बीच सर्वे किया गया। इसमें पता चला कि लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि राष्ट्रपति ने युद्ध शुरू ही क्यों किया। लोगों को लग रहा था कि ट्रम्प ने अपना वादा तोड़ा है और अब इस युद्ध के कारण उनकी रोजमर्रा की जिंदगी महंगी हो रही है। युद्ध का विरोध करने वाले ट्रम्प के कुछ पुराने सहयोगी भी अब खुलकर उनके खिलाफ हो गए थे। इनमें टकर कार्लसन और जॉर्जिया की पूर्व सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन शामिल थीं। सलाहकारों के मुताबिक, ट्रम्प जानते थे कि युद्ध के कारण उनका समर्थन घट रहा है। लेकिन कुछ समय के लिए उन्हें लगा कि अब इस मुसीबत से बाहर निकलने का रास्ता मिल गया है। ट्रम्प अपने शौक में उलझे रहे, जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया ट्रम्प की टीम के कुछ सदस्य इस बात से परेशान थे कि ट्रम्प सीमा सुरक्षा की तुलना में अपने नए बॉलरूम की ज्यादा बात करते थे। उन्हें किराने के सामान की बढ़ती कीमतों से ज्यादा गोल्फ कोर्स की चिंता थी। महंगाई के बजाय वे इमारतों की सजावट पर ध्यान दे रहे थे। मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले अपने आखिरी चुनावी भाषण में भी उन्होंने नेशनल मॉल के रिफ्लेक्टिंग पूल के नवीनीकरण की बात की। मजाक में कहा कि वे इसका नाम अब्राहम लिंकन के बजाय अपने नाम पर रखने के बारे में सोच रहे हैं। यही वह दूरी थी, जिसे लेकर उनकी टीम के लोग चिंतित थे। एक तरफ आम अमेरिकी महंगाई, महंगे पेट्रोल और ईरान युद्ध से परेशान थे, दूसरी तरफ राष्ट्रपति का ध्यान उन मुद्दों पर नहीं दिख रहा था। 28 अक्टूबर की वीडियो कॉल में जिस हार का अंदाजा लगाकर उनकी टीम अंतिम संस्कार और देश छोड़ने के मजाक कर रही थी, एक हफ्ते बाद चुनाव नतीजों ने उस डर को हकीकत में बदल दिया। ————————————-

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